चलती है कलम मेरी तेरे ज़ज्बात बयां करने,
लिखती है वो आखर ये जो तेरे अरमां को ज़ुबां देदे !
तू मुसाफिर है जो ठहरेगा न पल पर भी,
चलते चलते ही मेरे शब्दों को बस अपनी इक निगाह देदे !!
लिखती है वो आखर ये जो तेरे अरमां को ज़ुबां देदे !
तू मुसाफिर है जो ठहरेगा न पल पर भी,
चलते चलते ही मेरे शब्दों को बस अपनी इक निगाह देदे !!
© Ankita Jain